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International

US tariff on Indian Garments: अमेरिकी टैरिफ का झटका, 50% शुल्क से भारतीय गारमेंट निर्यात पर ब्रेक, खरीदार मांग रहे भारी डिस्काउंट

Gajendra Singh Tanwar
Last updated: 2026-01-24 12:05 पूर्वाह्न
Gajendra Singh Tanwar Published 2026-01-24
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US tariff on Indian Garments
US tariff on Indian Garments: अमेरिकी टैरिफ का झटका, 50% शुल्क से भारतीय गारमेंट निर्यात पर ब्रेक, खरीदार मांग रहे भारी डिस्काउंट
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US tariff on Indian Garments: अमेरिका के बाजार में भारतीय गारमेंट निर्यात (US tariff on Indian Garments) पर लगाए गए 50 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क का असर अब ज़मीन पर साफ दिखाई देने लगा है। इस फैसले के बाद भारत से अमेरिका जाने वाले लगभग सभी प्रकार के रेडीमेड गारमेंट पर कुल शुल्क 60 प्रतिशत से अधिक हो गया है। इसका सीधा असर यह हुआ है कि अमेरिकी खरीदार या तो भारतीय निर्यातकों से दूरी बना रहे हैं या फिर कीमतों में भारी छूट की मांग कर रहे हैं। गारमेंट इंडस्ट्री से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रही तो भारत के परंपरागत अमेरिकी बाजार में हिस्सेदारी कमजोर हो सकती है।

Contents
गारमेंट मेले में दिखी चिंता, नए ऑर्डर होल्ड परमेन्स वियर पर शुल्क 17% से बढ़कर 67%डिस्काउंट देकर भी नहीं हो रहा मुनाफाअन्य बाजार बने सहारा, EU से उम्मीदेंहाई-एंड सेगमेंट पर टैरिफ का असर सीमितबदलते हालात में रणनीति बदलने की जरूरत

गारमेंट मेले में दिखी चिंता, नए ऑर्डर होल्ड पर

अपैरल एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल (AEPC) की ओर से नई दिल्ली के यशोभूमि में आयोजित गारमेंट (US tariff on Indian Garments) मेले में हिस्सा लेने आए कई निर्यातकों ने अमेरिकी बाजार को लेकर चिंता जताई। जोधपुर स्थित गारमेंट निर्यातक अभिषेक सुराना के अनुसार, सितंबर 2024 के बाद से अमेरिका से मिलने वाले नए ऑर्डर लगभग होल्ड पर चले गए हैं महिलाओं की पोशाक का निर्यात करने वाले सुराना पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट भी हैं। उनका कहना है कि अब वे अमेरिका के बजाय यूरोप, अफ्रीका और मैक्सिको जैसे वैकल्पिक बाजारों पर अधिक निर्भर हो गए हैं।

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मेन्स वियर पर शुल्क 17% से बढ़कर 67%

यूरोप और अमेरिका दोनों में मेन्स वियर का निर्यात करने वाली कंपनी एचडब्ल्यू अपैरल के मुताबिक अमेरिकी बाजार में छोटे खरीदारों ने भारी टैरिफ के चलते खरीदारी लगभग बंद कर दी है। कंपनी के अनुसार, पहले अमेरिका में निर्यात होने वाले मेन्स वियर पर लगभग 17 प्रतिशत शुल्क लगता था, जो अब बढ़कर करीब 67 प्रतिशत हो गया है। एचडब्ल्यू अपैरल की दक्षिण भारत में 30 मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स हैं, जहां सैकड़ों श्रमिक कार्यरत हैं। कंपनी का कहना है कि यदि अमेरिकी मांग में लगातार गिरावट रही, तो उत्पादन और रोजगार पर भी दबाव बढ़ सकता है।

US tariff on Indian Garments
US tariff on Indian Garments

डिस्काउंट देकर भी नहीं हो रहा मुनाफा

गारमेंट निर्यातक और AEPC के पूर्व अध्यक्ष एच.के.एल. मगु के मुताबिक, जो निर्यातक अभी भी अमेरिका को माल भेज रहे हैं, उन्हें अपने खरीदारों को 10 से 15 प्रतिशत तक अतिरिक्त डिस्काउंट देना पड़ रहा है। उन्होंने कहा, ‘इतने भारी शुल्क और डिस्काउंट के बाद अमेरिका को किया जा रहा निर्यात लगभग ‘नो-प्रॉफिट’ स्थिति में पहुंच गया है। कई निर्यातक सिर्फ अपने पुराने रिश्ते बनाए रखने के लिए वहां सप्लाई कर रहे हैं।’

अन्य बाजार बने सहारा, EU से उम्मीदें

लुधियाना स्थित भंडारी होजरी एक्सपोर्ट हाउस के निदेशक अमृत मान ने बताया कि अमेरिकी शुल्क (US tariff on Indian Garments) का असर उनके निर्यात पर भी पड़ा है, लेकिन अन्य देशों से मिलने वाले ऑर्डर फिलहाल स्थिर हैं। उन्होंने उम्मीद जताई कि यदि भारत और यूरोपीय यूनियन के बीच मुक्त व्यापार समझौता (FTA) लागू होता है, तो यूरोप से गारमेंट ऑर्डर में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हो सकती है, जो अमेरिकी नुकसान की भरपाई कर सकेगी।

हाई-एंड सेगमेंट पर टैरिफ का असर सीमित

हालांकि, सभी निर्यातकों के लिए स्थिति एक जैसी नहीं है। लखनऊ स्थित एमएलके एक्सपोर्ट्स के निदेशक शिशिर कपूर का कहना है कि उनके अमेरिकी निर्यात में न तो कोई गिरावट आई है और न ही उन्हें किसी प्रकार का डिस्काउंट देना पड़ रहा है। कपूर के अनुसार, उनकी कंपनी हाई-एंड और स्पेशलाइज्ड गारमेंट का निर्यात करती है, जिसे बहुत कम देश बना पाते हैं। इसी वजह से अमेरिकी खरीदार अब भी पहले की तरह कीमत देने को तैयार हैं।

बदलते हालात में रणनीति बदलने की जरूरत

विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिकी टैरिफ ने भारतीय गारमेंट इंडस्ट्री (US tariff on Indian Garments) को अपनी रणनीति पर दोबारा विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है। मास मार्केट से हटकर वैल्यू-एडेड और हाई-एंड प्रोडक्ट्स पर फोकस, नए बाजारों की तलाश और व्यापार समझौतों का लाभ उठाना आने वाले समय में जरूरी होगा।

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