Kailash Mansarovar Yatra : 48 तीर्थयात्रियों का आखिरी जत्था वापस लौटा चुका हैं। यह यात्रा 30 जून 2025 को शुरू हुई थी और पांच साल के अंतराल के बाद आयोजित की गई थी।
इस यात्रा में कुल 720 श्रद्धालुओं ने भाग लिया। कैलाश मानसरोवर समिति की ओर से इन यात्रियों को और बाकी सभी पुराने यात्रियों को कैलाश मानसरोवर भवन में सम्मानित किया गया ।
Kailash Mansarovar Yatra : यात्रियों का आखिरी जत्था वापस
यह जत्था वापस आने के बाद सभी 720 तीर्थ यात्रियों ने बहुत आनंद के साथ इस यात्रा का वर्णन किया। कैलाश मानसरोवर समिति के पदाधिकारियों ने इस साल के तीर्थ यात्रियों को सम्मानित किया। यह सम्मान समारोह गाजियाबाद के इंदिरापुरम में बने कैलाश मानसरोवर भवन में आयोजित हुआ, जिसमें सैकड़ों तीर्थ यात्रियों ने सम्मान पाया ।

Kailash Mansarovar Yatra : 22 दिन चली यात्रा
आपको बता दे की यह यात्रा लगभग 22 दिनों तक चली, जिसमें 14 दिन भारत और 8 दिन तिब्बत में बिताने थे। इस धार्मिक यात्रा के लिए दो मार्ग थे – उत्तराखंड में लिपुलेख दर्रा और सिक्किम में नाथुला दर्रा। यात्रियों को इनमें से किसी मार्ग का चुनाव कर अपनी यात्रा को पूर्ण करना था।
Kailash Mansarovar Yatra : किन परिस्थितियों का करना पड़ता है सामना ?
हिंदू आस्था के अनुसार, कैलाश पर्वत भगवान शिव का निवास स्थान माना जाता है, जो इसे धार्मिक और सांस्कृतिक दोनों रूप से महत्वपूर्ण बनाता है। इस यात्रा में 19,500 फीट तक की ऊंचाई पर दुर्गम परिस्थितियों में चढ़ाई करनी पड़ती है, जिसमें खराब मौसम और ऊबड़-खाबड़ इलाका शामिल है यह यात्रा बहुत रिस्की मानी जाती हैं मगर आस्था और विश्वास इसे आसान बना देती है। इस बार सरकार की अच्छी व्यवस्था ने तीर्थयात्रियों के हौसले और विश्वास को और मजबूत बना दिया।
कैलाश मानसरोवर यात्रा की तैयारी यात्री बहुत दिनों पहले ही देते है। इस सत्र में शामिल होने वाले श्रद्धालुओं को हर कड़ी चुनौती का अभ्यास पहले ही करना सीखना पड़ता है। तीर्थ यात्रियों का मानना है कि यह यात्रा पहले कठिन लगती है मगर भगवान शिव की आस्था इसे आसान ही नहीं यादगार भी बना देती है ।
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