Rekha Gupta vs Kejriwal Comparison: दिल्ली की पॉलिटिक्स एक बार फिर गरमा गई है। इस बार वजह बनी है मुख्यमंत्री Rekha Gupta का वो बोल्ड स्टेटमेंट जिसमें उन्होंने अपने 11 महीने के काम की सीधी तुलना अरविंद केजरीवाल के 11 साल के शासन से कर दी। ये कम्पेरिजन सिर्फ एक पॉलिटिकल स्टेटमेंट नहीं, बाल्की एक नैरेटिव वॉर है जो सीधी जनता के बीच जा रहा है।
Rekha Gupta vs Kejriwal Comparison: काम बोलता है – रेखा गुप्ता का पॉलिटिकल पंच
रेखा गुप्ता का कहना है, ‘जो काम हमने 11 महीनों में किया, वो AAP 11 सालों में भी नहीं कर पाई।’ ये लाइन सिर्फ एक डायलॉग नहीं, बल्कि एक पॉलिटिकल पंचलाइन बन चुकी है। सोशल मीडिया पर इस स्टेटमेंट के क्लिप्स, रील्स और डिबेट्स तेजी से वायरल हो रहे हैं।
उनका फोकस डिलीवरी, स्पीड और अकाउंटेबिलिटी पर है। रेखा गुप्ता अपनी सरकार को ‘एक्शन-ओरिएंटेड’ बताती हैं, जब वो AAP के मॉडल को ‘अनाउंसमेंट-बेस्ड गवर्नेंस’ कहकर टारगेट करती हैं।
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Rekha Gupta vs Kejriwal Comparison: अरविंद केजरीवाल मॉडल – जनता, बिजली और ब्रांडिंग
अरविंद केजरीवाल का 11 साल का शासन दिल्ली पॉलिटिक्स में एक अलग चैप्टर रहा है। फ्री बिजली, फ्री पानी, मोहल्ला क्लीनिक और सरकारी स्कूलों का कायापलट, ये सभी AAP के लिए बातचीत के मजबूत मुद्दे रहे हैं।
लेकिन रेखा गुप्ता का मानना है कि ब्रांडिंग ज्यादा थी, ग्राउंड रियलिटी कम। उनका कहना है कि AAP ने ज्यादा फोकस एडवर्टाइजमेंट और पॉलिटिकल नैरेटिव पर दिया, जबकी गवर्नेंस के कोर इश्यू को इग्नोर किया गया।
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Rekha Gupta vs Kejriwal Comparison: 11 महीने की स्पीड बनाम 11 साल की स्ट्रैटेजी
रेखा गुप्ता अपने छोटे कार्यकाल को फास्ट-ट्रैक गवर्नेंस का उदाहरण बताती हैं। इंफ्रास्ट्रक्चर अप्रूवल, पेंडिंग प्रोजेक्ट्स का रिवाइवल, और एडमिनिस्ट्रेटिव देरी को कम करना ये सब उनके मुख्य दावे हैं।
वही अरविंद केजरीवाल के सपोर्टर कहते हैं कि 11 साल की स्ट्रैटेजी बिना समझे कम्पेरिजन करना गलत है। लॉन्ग-टर्म रिफॉर्म्स को 11 महीने के काम से कम्पेयर करना पॉलिटिकली कन्वीनिएंट हो सकता है, लेकिन ऑब्जेक्टिवली फेयर नहीं।
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Rekha Gupta vs Kejriwal Comparison: सोशल मीडिया पर पॉलिटिकल महाभारत
एक्स, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर #11MahineVs11Saal ट्रेंड कर रहा है। दोनों तरफ के सपोर्टर्स अपने-अपने नेताओं के अचीवमेंट्स गिना रहे हैं।
रेखा गुप्ता के सपोर्टर्स कहते हैं –
• काम दिखता है, सिर्फ पोस्टर नहीं।
• गवर्नेंस हो तो ऐसी हो।
वही AAP सपोर्टर्स काउंटर करते हैं –
• फ्री सुविधाओं का असर शॉर्ट-टर्म नहीं होता।
• दिल्ली मॉडल को पूरी दुनिया ने माना है।
यह डिजिटल बैटल ग्राउंड रियलिटी से ज्यादा परसेप्शन वॉर बन चुकी है।
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Rekha Gupta vs Kejriwal Comparison: जनता क्या सोच रही है?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि दिल्ली की जनता किस नैरेटिव पर विश्वास करेगी? क्या लोग स्पीड और जल्दी रिजल्ट को प्रायोरिटी देंगे, या फिर लॉन्ग-टर्म वेलफेयर पॉलिसी को?
शहरी वोटर शायद इंफ्रास्ट्रक्चर और एफिशिएंसी पर फोकस करें, जबकी मिडिल और लोअर-इनकम ग्रुप्स की वेलफेयर स्कीम को ज्यादा इंपॉर्टेंट मानते हैं। रेखा गुप्ता के लिए चैलेंज यह है कि वो शॉर्ट टेन्योर को लॉन्ग-टर्म विजन के साथ जोड़कर दिखाएं।
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Rekha Gupta vs Kejriwal Comparison: पॉलिटिकल टाइमिंग – स्टेटमेंट क्यों अब?
रेखा गुप्ता का यह बयान चुनाव से पहले आना कोई इत्तेफाक नहीं लगता। यह एक प्री-इलेक्शन पोजिशनिंग है जहां वो खुद को एक मजबूत विकल्प के रूप में प्रोजेक्ट कर रही हैं।
अरविंद केजरीवाल के लिए यह तुलना असहज हो सकती है, क्योंकि उम्मीदें हमेशा ज्यादा होती हैं जब आप सत्ता में लंबे समय तक रहे हों।
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