लोकसभा में उत्तर प्रदेश के बरेली से सांसद नीरज मौर्य ने दो ऐसे महत्वपूर्ण मुद्दे उठाए जिनका सीधा संबंध गांव, किसानों और पर्यावरण से है। संसद में एक ओर भूजल में बढ़ते नाइट्रेट प्रदूषण की चिंता जताई गई, वहीं दूसरी ओर SATAT Scheme के तहत कंप्रेस्ड बायो-गैस (CBG) संयंत्रों को मिलने वाली सहायता पर सवाल खड़े किए गए। दोनों विषयों पर केंद्र सरकार ने अपना पक्ष रखा, लेकिन जमीनी चुनौतियां अब भी बनी हुई हैं।
SATAT Scheme के साथ भूजल में नाइट्रेट प्रदूषण पर बढ़ी चिंता
केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय ने संसद में स्वीकार किया कि कृषि क्षेत्र में रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से कई इलाकों में भूजल में नाइट्रेट की मात्रा लगातार बढ़ रही है। इससे पेयजल की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है और लोगों के स्वास्थ्य पर भी खतरा बढ़ रहा है।
मंत्रालय के अनुसार, केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) देशभर में भूजल की नियमित निगरानी कर रहा है। नाइट्रेट प्रभावित क्षेत्रों की पहचान कर राज्यों को आवश्यक जानकारी उपलब्ध कराई जा रही है। इसके अलावा सरकार मृदा स्वास्थ्य कार्ड, प्राकृतिक खेती, भारतीय प्राकृतिक कृषि पद्धति, जल शक्ति अभियान और मिशन अमृत सरोवर जैसी योजनाओं के माध्यम से स्थिति सुधारने का प्रयास कर रही है।
सरकार ने यह भी बताया कि देशभर में 24 हजार से अधिक डिजिटल वॉटर लेवल रिकॉर्डर स्थापित किए गए हैं, जिनकी मदद से भूजल स्तर और गुणवत्ता की निगरानी की जा रही है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि केवल निगरानी पर्याप्त नहीं है, बल्कि स्थानीय स्तर पर प्रभावी कार्रवाई भी जरूरी है।
CBG संयंत्रों को नहीं मिलती सीधी आर्थिक सहायता
संसद में उठाया गया दूसरा बड़ा मुद्दा SATAT Scheme से जुड़ा रहा। पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि कंप्रेस्ड बायो-गैस संयंत्र स्थापित करने के लिए केंद्र सरकार किसी प्रकार की प्रत्यक्ष वित्तीय सहायता उपलब्ध नहीं कराती।
मंत्रालय के अनुसार, SATAT Scheme पूरी तरह उद्यमियों की व्यावसायिक क्षमता और निवेश पर आधारित है। तेल विपणन कंपनियां केवल गैस खरीदने के लिए दीर्घकालिक समझौते करती हैं। संयंत्र लगाने, वित्त जुटाने और संचालन की जिम्मेदारी निजी निवेशकों की होती है।
31 जुलाई 2026 तक देशभर में 217 CBG संयंत्र चालू हो चुके हैं, जिनकी कुल उत्पादन क्षमता लगभग 1,773 टन प्रतिदिन है। उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक सक्रिय राज्यों में शामिल होते हुए 41 संयंत्र संचालित हो रहे हैं।
SATAT Scheme के सामने जमीनी स्तर पर कई चुनौतियां
हालांकि आंकड़े सकारात्मक दिखाई देते हैं, लेकिन SATAT Scheme के क्रियान्वयन में कई व्यावहारिक समस्याएं सामने आ रही हैं। निवेशकों और उद्यमियों को भूमि उपलब्धता, कच्चे माल की निरंतर आपूर्ति, बैंक वित्तपोषण और पाइपलाइन कनेक्टिविटी जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
सरकार ने बताया कि इन समस्याओं को दूर करने के लिए DPI योजना के तहत गैस पाइपलाइन कनेक्टिविटी उपलब्ध कराई जा रही है। साथ ही समय-समय पर समीक्षा बैठकें आयोजित कर परियोजनाओं की प्रगति का मूल्यांकन किया जाता है। इसके बावजूद कई प्रस्तावित परियोजनाएं अब भी विभिन्न कारणों से लंबित हैं।
SATAT Scheme को मजबूत करने की मांग
सांसद नीरज मौर्य ने कहा कि यदि ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार बढ़ाना है, पराली जलाने की समस्या कम करनी है और स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन को प्रोत्साहन देना है, तो SATAT Scheme को और अधिक प्रभावी बनाना होगा। इसके लिए CBG संयंत्रों को प्रत्यक्ष सहायता, सरल स्वीकृति प्रक्रिया और तेज पाइपलाइन कनेक्टिविटी उपलब्ध कराना आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि वर्तमान व्यवस्था में कई निवेशक प्रारंभिक लागत और प्रक्रियागत जटिलताओं के कारण परियोजनाओं में आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था और स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र दोनों प्रभावित हो रहे हैं।
SATAT Scheme और किसानों की उम्मीदें अभी बाकी
भूजल में बढ़ते नाइट्रेट प्रदूषण और SATAT Scheme की चुनौतियां यह संकेत देती हैं कि योजनाओं की घोषणा के साथ-साथ उनका प्रभावी क्रियान्वयन भी उतना ही महत्वपूर्ण है। सरकार द्वारा कई पहलें शुरू की गई हैं, लेकिन किसानों, ग्रामीण समुदायों और निवेशकों को अब भी ठोस सहायता और तेज समाधान की अपेक्षा है।
फिलहाल कागजों पर बड़ी योजनाएं दिखाई देती हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर अपेक्षित परिणाम हासिल करने के लिए और अधिक प्रयासों की जरूरत महसूस की जा रही है।
बरेली | रिपोर्ट : सुमित श्रीवास्तव
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