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Mojtaba Khamenei Supreme Leader: मोजतबा खामेनेई बने ईरान के नए सर्वोच्च नेता, बैठकों में हुआ ऐतिहासिक फैसला

Lokhit Kranti
Last updated: 2026-03-04 11:30 am
Lokhit Kranti Published 2026-03-04
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Mojtaba Khamenei Supreme Leader
Mojtaba Khamenei Supreme Leader: मोजतबा खामेनेई बने ईरान के नए सर्वोच्च नेता, बैठकों में हुआ ऐतिहासिक फैसला
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Mojtaba Khamenei Supreme Leader: अमेरिका-इजरायल के संयुक्त हवाई हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई (Ali Khamenei) की मौत के बाद देश में पैदा हुए नेतृत्व संकट का पटाक्षेप हो गया है। ईरान की विशेषज्ञ सभा (Assembly of Experts) ने बुधवार को उनके बेटे मोजतबा खामेनेई (Mojtaba Khamenei Supreme Leader) को नया सर्वोच्च नेता चुन लिया। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब देश युद्ध जैसी स्थिति का सामना कर रहा है और सत्ता के भीतर गुटबाजी चरम पर है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया, खासकर ईरान इंटरनेशनल (Iran International) की रिपोर्ट के अनुसार, यह चयन शक्तिशाली सुरक्षा संगठन Islamic Revolutionary Guard Corps (IRGC) के दबाव में किया गया।

Contents
वर्चुअल बैठकों में हुआ ऐतिहासिक फैसलाकौन हैं मोजतबा खामेनेई?वंशवाद पर छिड़ी बहसहमलों के बाद सत्ता का संक्रमणक्षेत्रीय और वैश्विक असर

वर्चुअल बैठकों में हुआ ऐतिहासिक फैसला

रिपोर्ट्स के मुताबिक, मौजूदा सुरक्षा हालात के कारण विशेषज्ञ सभा की पूर्ण बैठक संभव नहीं हो सकी। इसलिए निर्णय आभासी बैठकों और सीमित आंतरिक परामर्श के जरिए लिया गया। सूत्रों का दावा है कि IRGC ने कट्टरपंथी धड़े को एकजुट कर मोजतबा (Mojtaba Khamenei Supreme Leader) के पक्ष में माहौल बनाया। सुरक्षा प्रतिष्ठान में उनकी गहरी पकड़ और पिता के करीबी सहयोगी होने की छवि ने इस फैसले को गति दी। यह भी कहा जा रहा है कि युद्धकालीन अस्थिरता में सत्ता का जल्द केंद्रीकरण IRGC की प्राथमिकता थी, ताकि सैन्य और राजनीतिक कमान में कोई शून्य न रहे।

Read More: भारत में उत्सव, सऊदी अरब में प्रतिबंध, क्यों सऊदी में रंगों का त्योहार नहीं मनाया जा सकता खुलेआम?

कौन हैं मोजतबा खामेनेई?

56 वर्षीय मोजतबा खामेनेई (Mojtaba Khamenei Supreme Leader) एक मध्यम स्तर के शिया धर्मगुरु हैं। उन्हें ‘हुज्जतुल इस्लाम’ रैंक प्राप्त है, जो धार्मिक पदानुक्रम में सर्वोच्च स्तर नहीं माना जाता। वे लंबे समय से पर्दे के पीछे प्रभावशाली भूमिका निभाते रहे हैं। विश्लेषकों का मानना है कि उनका संबंध IRGC और बसिज मिलिशिया से गहरा रहा है, जिससे उन्हें सुरक्षा तंत्र में मजबूत समर्थन मिला। हालांकि वे सार्वजनिक जीवन में अपेक्षाकृत कम दिखाई देते हैं, लेकिन सत्ता गलियारों में उनकी सक्रियता और रणनीतिक भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

वंशवाद पर छिड़ी बहस

ईरान की 1979 की इस्लामी क्रांति की मूल विचारधारा राजशाही और वंशानुगत सत्ता के खिलाफ थी। ऐसे में पिता के बाद बेटे का सर्वोच्च नेता बनना कई हलकों में “राजशाही जैसी परंपरा” की वापसी के तौर पर देखा जा रहा है। कुछ कट्टरपंथी गुट भी इस निर्णय से असहज बताए जा रहे हैं। उनका मानना है कि सर्वोच्च नेता के पद के लिए उच्च धार्मिक योग्यता आवश्यक है, जो मोजतबा के मामले में विवाद का विषय है।

इसके बावजूद IRGC का समर्थन निर्णायक साबित हुआ। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, वर्तमान संघर्ष की स्थिति में धार्मिक योग्यता से अधिक सुरक्षा और स्थिरता को प्राथमिकता दी गई।

हमलों के बाद सत्ता का संक्रमण

अली खामेनेई की मृत्यु 28 फरवरी 2026 को अमेरिका-इजरायल के संयुक्त हमलों में हुई थी। इस घटना ने ईरान की राजनीति में हलचल मचा दी थी। सत्ता के अस्थायी संचालन के लिए तीन सदस्यीय अंतरिम परिषद बनाई गई थी, जिसमें राष्ट्रपति, न्यायपालिका प्रमुख और गार्जियन काउंसिल के एक वरिष्ठ ज्यूरिस्ट शामिल थे। विदेश मंत्री Abbas Araghchi ने संकेत दिया था कि नया नेता शीघ्र चुना जाएगा। अब मोजतबा की नियुक्ति के साथ यह संक्रमण काल औपचारिक रूप से समाप्त हो गया है।

क्षेत्रीय और वैश्विक असर

मोजतबा खामेनेई (Mojtaba Khamenei Supreme Leader) की ताजपोशी ऐसे समय में हुई है जब मध्य पूर्व पहले से ही अस्थिर है। विश्लेषकों का मानना है कि इससे ईरान में कट्टरपंथी ताकतों की पकड़ और मजबूत होगी। संभावना है कि विदेश नीति में कठोर रुख जारी रहेगा और अमेरिका-इजरायल के साथ तनाव और बढ़ सकता है। वहीं, घरेलू मोर्चे पर विपक्षी समूहों और सुधारवादियों के लिए चुनौतियां बढ़ने की आशंका है। यह सत्ता परिवर्तन केवल एक नेतृत्व बदलाव नहीं, बल्कि ईरान की राजनीतिक दिशा का संकेत भी है जहां सुरक्षा प्रतिष्ठान की भूमिका पहले से अधिक प्रभावशाली दिखाई दे रही है।

मोजतबा खामेनेई का चयन ईरान की राजनीति में एक निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है। जहां एक ओर इसे स्थिरता की दिशा में उठाया गया कदम बताया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर वंशवाद और धार्मिक योग्यता को लेकर उठते सवाल आने वाले समय में नई बहस को जन्म दे सकते हैं। युद्ध, आंतरिक शक्ति संतुलन और वैचारिक टकराव के बीच ईरान का भविष्य किस दिशा में जाएगा, यह आने वाले महीनों में स्पष्ट होगा।

Also read:  मोदी-नेतन्याहू की दोस्ती का नया रंग, भारतीय परिधान में दिखे इजरायल के प्रधानमंत्री, नेसेट में गूंजा भारत-इजरायल साझेदारी का संदेश

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