Holi 2026: होली का त्योहार आते ही घरों में रंगों के साथ जिस खुशबू का सबसे ज्यादा इंतज़ार होता है, वह है ताज़ी तली हुई गुझिया की. यह सिर्फ एक मिठाई नहीं, बल्कि एक परंपरा है जो पीढ़ियों से चली आ रही है. बदलते दौर में इसके स्वाद और भरावन में कई प्रयोग हुए, लेकिन इसकी पहचान और आकार लगभग वैसा ही बना रहा. Holi 2026 के मौके पर यह सवाल फिर चर्चा में है कि आखिर Gujiya की जड़ें कहां तक जाती हैं और क्या इसका संबंध मुगलकाल से है?
प्राचीन भारतीय रसोई से जुड़ी कहानी
खाद्य इतिहास के जानकार मानते हैं कि गुझिया की कहानी बेहद पुरानी है. भारत में तली हुई मीठी पकवानों की परंपरा वैदिक काल तक जाती है. पुराने ग्रंथों में ‘अपूप’ और ‘पुआ’ जैसे व्यंजनों का उल्लेख मिलता है, जो आटे और गुड़ या शहद से बनाए जाते थे. माना जाता है कि गुझिया का शुरुआती रूप ‘शष्कुली’ नामक मिठाई से जुड़ा हो सकता है, जिसमें मैदा और मीठा मिश्रण इस्तेमाल होता था.
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प्रसिद्ध खाद्य इतिहासकार K. T. Achaya ने अपनी चर्चित पुस्तक Indian Food: A Historical Companion में भारतीय व्यंजनों के विकास पर विस्तार से लिखा है. उनके अनुसार, मध्यकाल तक आते-आते ऐसे कई व्यंजन प्रचलन में आ चुके थे जिनमें आटे की परत के भीतर मीठा भरकर तला जाता था. हालांकि उस समय इन्हें गुझिया नहीं कहा जाता था, लेकिन उनकी संरचना आज की गुझिया से मिलती-जुलती थी.
मुगलों का असर कितना?
अक्सर Gujiya को मुगलकाल से जोड़कर देखा जाता है. इसकी वजह है समोसे की परंपरा, जो मध्य एशिया से भारत आई थी. Samosa मूल रूप से ‘समसा’ नाम से जाना जाता था और तुर्की व मध्य एशिया में लोकप्रिय था. मुगलों के आगमन के साथ यह व्यंजन भारतीय रसोई का हिस्सा बना.
कुछ इतिहासकारों का मानना है कि मीठी गुझिया संभवतः समोसे की अवधारणा से प्रेरित रही हो. मुगलकाल में शाही रसोई में मावा, मेवा और केसर जैसे समृद्ध पदार्थों का इस्तेमाल बढ़ा. इसी दौर में सूखे मेवों से भरी मिठाइयों का चलन तेज हुआ. तुर्की की मशहूर मिठाई Baklava में भी परतों के बीच मेवे भरे जाते हैं, जो इस सांस्कृतिक आदान-प्रदान की ओर इशारा करता है.
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फिर भी, Gujiya का आकार और उसकी पारंपरिक डिजाइन इसे समोसे से अलग पहचान देते हैं. यह कहना ज्यादा उचित होगा कि गुझिया भारतीय परंपरा की उपज है, जिसमें मुगलकालीन स्वाद और शाही सामग्री ने नई परतें जोड़ीं.
देशभर में बदले नाम और स्वाद
गुझिया की सबसे दिलचस्प बात यह है कि यह पूरे भारत में अलग-अलग नामों से जानी जाती है. उत्तर प्रदेश और बिहार में इसे गुझिया या पेड़किया कहा जाता है. महाराष्ट्र में यह ‘करंजी’ के नाम से प्रसिद्ध है. दक्षिण भारत में ‘कज्जीकायलू’ और ‘सोमास’ के रूप में यह त्योहारों का हिस्सा है, जबकि गुजरात में इसे ‘घुघरा’ कहा जाता है.
हर क्षेत्र में इसकी भरावन स्थानीय स्वाद के अनुसार बदल जाती है. कहीं मावा और सूजी का मिश्रण, तो कहीं नारियल और गुड़. दक्षिण में चने की दाल और इलायची की खुशबू मिलती है. विविधता के बावजूद इसकी मूल भावना—त्योहार की मिठास—हर जगह समान रहती है.
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होली से गहरा नाता
Holi 2026 और Gujiya का रिश्ता सिर्फ स्वाद तक सीमित नहीं है. पुराने समय में महिलाएं मिलकर गुझिया बनाती थीं, जो सामाजिक मेलजोल का एक अहम अवसर होता था. यह सामूहिक तैयारी परिवार और पड़ोस के रिश्तों को मजबूत करती थी.
मार्च के महीने में मौसम बदलता है और शरीर को अतिरिक्त ऊर्जा की जरूरत होती है. मावा, घी और मेवों से भरपूर गुझिया इस आवश्यकता को पूरा करती है. साथ ही, इसे कई दिनों तक सुरक्षित रखा जा सकता है, जिससे त्योहार के दौरान मेहमानों की आवभगत आसान हो जाती है.
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परंपरा और आधुनिकता का संगम
आज बाजार में चॉकलेट, पान और ड्राई फ्रूट मिक्स जैसी नई फ्लेवर वाली गुझिया उपलब्ध हैं. कई लोग इसे तलने की बजाय बेक करना पसंद करते हैं ताकि कैलोरी कम हो. लेकिन पारंपरिक मावा गुझिया का स्वाद अब भी सबसे ज्यादा लोकप्रिय है.
इतिहास के लंबे सफर में Gujiya ने कई संस्कृतियों का स्पर्श पाया, लेकिन इसकी आत्मा भारतीय ही रही. यह मिठाई बताती है कि भारत की रसोई केवल स्वाद का नहीं, बल्कि सांस्कृतिक संवाद का भी प्रतीक है.
Holi 2026 पर जब आप Gujiya का पहला कौर लें, तो याद रखिए कि यह सिर्फ एक पकवान नहीं, बल्कि सदियों की परंपरा और मेल-जोल की कहानी है—जो हर साल रंगों के साथ फिर से जीवंत हो उठती है.
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