Garhwal Himalaya: उत्तराखंड के Garhwal Himalaya की शांत घाटियों में वैज्ञानिकों ने Garhwal Himalaya और वैश्विक जलवायु के लिए अहम संकेत देने वाला नया शोध प्रस्तुत किया है। IIT Roorkee और वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी की टीम ने गढ़वाल के ग्रेनाइट चट्टानों के मौसम जनित अपक्षय (weathering) पर विस्तृत अध्ययन किया। इस अध्ययन में पाया गया कि मॉनसून प्रभावित क्षेत्रों में चट्टानों का टूटना शुष्क ऊपरी Garhwal Himalaya की तुलना में साढ़े तीन गुना तेज और रासायनिक तत्वों का प्रवाह लगभग दोगुना है।
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नमी और मॉनसून का प्रभाव
वैज्ञानिकों के अनुसार, मॉनसून क्षेत्रों में नमी, तापमान और सूक्ष्मजीवों की सक्रियता चट्टानों के रासायनिक अपक्षय को तेज करती है। पानी और जैविक गतिविधियां नई सतहें पैदा करती हैं, जिससे भू-तापीय और टेक्टोनिक गतिविधियों के प्रभाव से चट्टानों का टूटना और घुलना बढ़ जाता है। इससे नदियों में घुलनशील खनिजों की आपूर्ति, कार्बन डाइऑक्साइड का प्राकृतिक अवशोषण और Garhwal Himalaya भू-दृश्य के विकास पर सीधा असर पड़ता है।
देवगुरु और मलारी ग्रेनाइट की तुलना
अध्ययन में देवगुरु ग्रेनाइट और मलारी ग्रेनाइट की तुलना की गई। देवगुरु ग्रेनाइट मॉनसून से कम प्रभावित क्षेत्रों में है, जबकि मलारी ग्रेनाइट उच्च Garhwal Himalaya के नम और मॉनसून प्रभावित क्षेत्र में स्थित है। यू-सीरीज आइसोटोप तकनीक का इस्तेमाल कर वैज्ञानिकों ने अपक्षय की गति और समय का अधिक सटीक अंदाज लगाया। शोध में पाया गया कि उच्च नमी वाले Garhwal Himalaya क्षेत्रों में रासायनिक अपक्षय तेज होता है और मिट्टी की ऊपरी परत जल्दी परिपक्व (mature) होती है।
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Garhwal Himalaya Lavadi और Malari वेदरिंग प्रोफाइल
वैज्ञानिकों ने मंदाकिनी घाटी के लावड़ी गांव में एक महत्वपूर्ण स्थल खोजा, जिसे Lavadi Weathering Profile कहा गया। यह करोड़ों साल पुराने पोर्फिरी ग्रेनाइट की मिट्टी बनने की प्रक्रिया को दर्शाता है। वहीं, चमोली जिले के मलारी क्षेत्र में Malari Weathering Profile पाया गया, जिसमें 1.7 से 2.4 करोड़ साल पुरानी ल्यूको ग्रेनाइट पर दुर्लभ खनिज टूरमैलीन और मस्कोवाइट मौजूद हैं। यह अध्ययन Garhwal Himalaya की ऊपरी क्रिस्टलाइन परत और सूक्ष्मजीव गतिविधियों के प्रभाव को समझने में अहम साबित हो रहा है।

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ऊपरी और निचली मिट्टी पर प्रभाव
शोध में पाया गया कि मौसम का प्रभाव मिट्टी की ऊपरी परतों पर अधिक दिखाई देता है। लगभग 1.8 मीटर तक की ऊपरी मिट्टी में कैल्शियम, सोडियम और पोटैशियम घट रहे हैं, जबकि लोहा, टाइटेनियम और मैग्नीशियम बढ़ रहे हैं। निचली परतों में बदलाव धीमी गति से हो रहा है। इससे स्पष्ट होता है कि Garhwal Himalaya भू-दृश्य में अपक्षय की गति और प्रकार अलग-अलग परतों में भिन्न है।
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टेक्टोनिक और भूगर्भीय गतिविधियों का योगदान
Garhwal Himalaya टेक्टोनिक रूप से सक्रिय क्षेत्र है। इस वजह से भू-गतिकीय हलचल, बारिश और बर्फबारी के चलते कुछ क्षेत्रों में अपरदन (erosion) बहुत तेज होता है। वहीं, ढलान कम क्षेत्रों में मिट्टी बहने की दर केवल 60–80 मिलीमीटर प्रति हजार साल है। इस अध्ययन ने दिखाया कि तेज अपरदन वाले क्षेत्रों में पुराना अपक्षय रिकॉर्ड जल्दी नष्ट हो सकता है।
वैज्ञानिकों का निष्कर्ष
डॉ. प्रदीप श्रीवास्तव, आईआईटी रुड़की के वैज्ञानिक ने कहा, “Garhwal Himalaya में चट्टानों का रासायनिक अपक्षय, भू-गतिकीय गतिविधियों और मॉनसून के प्रभाव से तेजी से बढ़ रहा है। यह अध्ययन भविष्य में Garhwal Himalaya की पारिस्थितिक स्थिरता और भूगर्भीय इतिहास को समझने में निर्णायक साबित होगा।”
इस शोध से Garhwal Himalaya भू-दृश्य, जलवायु संतुलन और नदी-तंत्र में पोषक तत्वों के प्रवाह के संबंध में महत्वपूर्ण जानकारी मिली है। साथ ही, यह अध्ययन यह भी दर्शाता है कि मॉनसून और नमी का हिमालयी अपक्षय पर असर, वैश्विक जलवायु और भविष्य के जल संसाधन प्रबंधन के लिए बेहद अहम है।



