Muhammad Yunus: बांग्लादेश की सियासत में इन दिनों एक बड़ा सवाल चर्चा का केंद्र बना हुआ है। हर जगह इसी बात की चर्चा हो रही है कि अंतरिम सरकार के मुखिया रहे Muhammad Yunus आगे क्या भूमिका निभाएंगे? उनका कार्यकाल समाप्ति की ओर है और इसी के साथ यह अटकलें तेज हो गई हैं कि उन्हें देश में किसी महत्वपूर्ण संवैधानिक पद पर देखा जा सकता है। राजनीतिक गलियारों में यहां तक चर्चा है कि उन्हें राष्ट्रपति पद के लिए भी आगे बढ़ाया जा सकता है।
हालांकि अभी तक इस पर कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। मौजूदा राष्ट्रपति मोहम्मद शहाबुद्दीन का कार्यकाल अप्रैल 2023 से शुरू होकर पांच वर्षों तक चलेगा। इसके बावजूद संभावनाओं की चर्चा इसलिए तेज है क्योंकि सत्ता संभालने जा रही Bangladesh Nationalist Party (BNP) की नई सरकार उनके अनुभव और वैश्विक पहचान का लाभ लेना चाहती है।
क्या राष्ट्रपति पद पर हुई है कोई चर्चा?
BNP प्रमुख Tarique Rahman के अंतरराष्ट्रीय मामलों के सलाहकार हुमायूं कबीर ने साफ किया है कि Muhammad Yunus के लिए किसी विशेष पद को लेकर अब तक कोई औपचारिक चर्चा नहीं हुई है। उन्होंने कहा,’तारिक रहमान समावेशी शासन चाहते हैं और अगर उनकी सरकार बनती है तो वे देश के काबिल और अनुभवी लोगों को साथ लेकर चलेंगे।’कबीर के मुताबिक, यूनुस की विशेषज्ञता और अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा का उपयोग देशहित में किया जा सकता है, लेकिन अभी किसी संवैधानिक भूमिका पर बातचीत तय नहीं हुई है।
राष्ट्रपति बनने से क्या होगा फायदा?
बांग्लादेश मामलों के जानकार कॉलमनिस्ट डेविड बर्गमैन ने दावा किया है कि तारिक रहमान और यूनुस के बीच राष्ट्रपति पद को लेकर चर्चा हुई थी। हालांकि BNP और यूनुस की टीम ने इससे इनकार किया है। बर्गमैन का मानना है कि यदि Muhammad Yunus राष्ट्रपति बनते हैं, तो यह बांग्लादेश के लिए सकारात्मक संकेत हो सकता है। उनकी वैश्विक साख और विकास आधारित सोच देश की अंतरराष्ट्रीय छवि को मजबूत कर सकती है।
राजनीति से दूरी बनाना चाहते हैं यूनुस
यूनुस के प्रेस सेक्रेटरी शफीकुल आलम ने स्पष्ट किया कि Muhammad Yunus सक्रिय राजनीति में दिलचस्पी नहीं रखते। उन्होंने कहा, यूनुस राजनीति में रहना नहीं चाहते।’ बताया गया कि यूनुस अपने ‘थ्री जीरो’ विजन पर ध्यान केंद्रित करना चाहते हैं। जीरो गरीबी,जीरो बेरोजगारी, जीरो कार्बन उत्सर्जन, वह वैश्विक स्तर पर युवाओं के साथ काम करने और सामाजिक बदलाव की दिशा में अपनी पहल को आगे बढ़ाना चाहते हैं।
माइक्रोफाइनेंस से नोबेल तक का सफर
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान चटगांव में जन्मे यूनुस ने चटगांव विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र पढ़ाया। माइक्रोफाइनेंस मॉडल के जरिए उन्होंने गरीबों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने का रास्ता दिखाया। उनके इसी योगदान के लिए उन्हें वर्ष 2006 में नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।



