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IUML Leader News: IUML के मौलाना कौसर हयात खान का वंदे मातरम् अनिवार्यता पर बड़ा बयान

ShreeJi
Last updated: 2026-02-14 12:26 पूर्वाह्न
ShreeJi Published 2026-02-14
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IUML Leader News:
IUML Leader News: IUML के मौलाना कौसर हयात खान का वंदे मातरम् अनिवार्यता पर बड़ा बयान
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Vande Mataram Mandatory: भारत की राजनीति में एक बार फिर राष्ट्रवाद और धार्मिक पहचान आमने-सामने खड़े दिखाई दे रहे हैं। ‘वंदे मातरम्‘ को अनिवार्य रूप से गाने के मुद्दे पर नई बहस छिड़ गई है। इस बार केंद्र में हैं इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) से जुड़े मौलाना कौसर हयात खान, जिन्होंने इस प्रस्ताव का कड़ा विरोध करते हुए इसे धार्मिक स्वतंत्रता पर दबाव बताया है।

Contents
Vande Mataram Mandatory: वंदे मातरम् अनिवार्यता – विवाद की जड़ क्या है?Vande Mataram Mandatory: मौलाना कौसर हयात खान का बयान – धार्मिक पहचान पर दबाव?Vande Mataram Mandatory: संवैधानिक नजरिया – कानून क्या कहता है?Vande Mataram Mandatory: राजनीतिक प्रतिक्रिया – पक्ष और विपक्ष आमने-सामनेVande Mataram Mandatory: इतिहास और भावनाएं – वंदे मातरम् का महत्वVande Mataram Mandatory: सामाजिक सौहार्द बनाम राजनीतिक ध्रुवीकरणVande Mataram Mandatory: आगे क्या?

उनका बयान आते ही राजनीतिक गलियारों में हलचल मच गई। समर्थक इसे संविधान के तहत धार्मिक आजादी का सवाल बता रहे हैं, जबकि विरोधी इसे राष्ट्रभावना के खिलाफ करार दे रहे हैं। आखिर क्या है पूरा मामला? और क्यों हर कुछ वर्षों में ‘वंदे मातरम्वि’ वाद सुर्खियों में लौट आता है?

Vande Mataram Mandatory: वंदे मातरम् अनिवार्यता – विवाद की जड़ क्या है?

‘वंदे मातरम्’ भारत के स्वतंत्रता संग्राम का एक ऐतिहासिक नारा और गीत रहा है। कई राज्यों में समय-समय पर इसे स्कूलों या सरकारी संस्थानों में गाने का प्रस्ताव सामने आता रहा है। समर्थकों का तर्क है कि यह देशभक्ति का प्रतीक है और इसे गाना राष्ट्रीय एकता को मजबूत करता है।

लेकिन विरोधी पक्ष का कहना है कि देशभक्ति किसी एक गीत या नारे से तय नहीं हो सकती। मौलाना कौसर हयात खान का कहना है कि देशप्रेम दिल से आता है, न कि किसी आदेश से। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या किसी नागरिक की वफादारी सिर्फ एक गीत गाने से मापी जा सकती है?

Vande Mataram Mandatory: मौलाना कौसर हयात खान का बयान – धार्मिक पहचान पर दबाव?

मौलाना ने आरोप लगाया कि ‘वंदे मातरम्’ को अनिवार्य बनाने की कोशिश एक विशेष विचारधारा को बढ़ावा देने का प्रयास है। उनके अनुसार, अगर किसी समुदाय को उसकी इच्छा के विरुद्ध कोई सांस्कृतिक या धार्मिक प्रतीक अपनाने के लिए बाध्य किया जाता है, तो यह लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है।

उन्होंने कहा कि देशभक्ति और धर्म को अलग-अलग रखना चाहिए। लोकतंत्र में हर नागरिक को अपनी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार आचरण करने की स्वतंत्रता है।

Read : ‘वंदे मातरम्’ अनिवार्य फैसले पर देश में गरमाई राजनीति, अरशद मदनी के बयान से बढ़ी तकरार

Vande Mataram Mandatory: संवैधानिक नजरिया – कानून क्या कहता है?

भारत का संविधान हर नागरिक को धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार देता है। Article 25 के तहत, हर व्यक्ति को अपने धर्म का पालन, प्रचार और अभ्यास करने की स्वतंत्रता है।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसी राज्य में ‘वंदे मातरम्’ को अनिवार्य किया जाता है, तो उसे संवैधानिक कसौटी पर परखा जाएगा। भारत के सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी कहा है कि देशभक्ति की अभिव्यक्ति के तरीके अलग-अलग हो सकते हैं और इसे जबरन थोपना उचित नहीं। यानी, यह सिर्फ राजनीतिक बहस नहीं बल्कि संवैधानिक व्याख्या का भी विषय है।

Vande Mataram Mandatory: राजनीतिक प्रतिक्रिया – पक्ष और विपक्ष आमने-सामने

IUML नेताओं ने मौलाना के बयान का समर्थन किया है। उनका कहना है कि धार्मिक स्वतंत्रता किसी भी लोकतंत्र की आधारशिला है। वहीं कई राष्ट्रवादी संगठनों और नेताओं ने इस बयान की आलोचना की। उनका कहना है कि “वंदे मातरम्” स्वतंत्रता संग्राम की विरासत है और इसका विरोध देश की भावनाओं को आहत करता है।

सोशल मीडिया पर भी यह मुद्दा तेजी से ट्रेंड कर रहा है। कुछ इसे अल्पसंख्यकों के अधिकारों का सवाल बता रहे हैं, तो कुछ इसे तुष्टिकरण की राजनीति करार दे रहे हैं।

Vande Mataram Mandatory: इतिहास और भावनाएं – वंदे मातरम् का महत्व

‘वंदे मातरम्’ की रचना महान साहित्यकार बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने की थी। यह गीत उनके उपन्यास आनन्द मठ में शामिल था। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान यह गीत अंग्रेजी शासन के खिलाफ एक मजबूत प्रतीक बन गया। क्रांतिकारियों ने इसे प्रेरणा के स्रोत के रूप में अपनाया। हालांकि, समय-समय पर इसकी कुछ पंक्तियों को लेकर धार्मिक आपत्तियां भी उठती रही हैं, खासकर देवी-स्वरूप चित्रण को लेकर। यही वजह है कि ‘वंदे मातरम्’ सिर्फ एक गीत नहीं, बल्कि भावनाओं और विचारधाराओं का संगम है।

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Vande Mataram Mandatory: सामाजिक सौहार्द बनाम राजनीतिक ध्रुवीकरण

विश्लेषकों का मानना है कि चुनावी मौसम में ऐसे मुद्दे अधिक उभरते हैं। धार्मिक पहचान और राष्ट्रवाद जैसे विषय समाज को दो हिस्सों में बांट सकते हैं।

मूल सवाल यही है कि, क्या देशभक्ति और धार्मिक पहचान को जोड़ा जाना चाहिए? या लोकतंत्र में दोनों का स्वतंत्र और समान सम्मान होना चाहिए?

इस बहस का असर सिर्फ संसद तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह समाज के अलग-अलग वर्गों में चर्चा का विषय बनेगा।

Vande Mataram Mandatory: आगे क्या?

अगर किसी राज्य सरकार द्वारा ‘वंदे मातरम्’ को अनिवार्य करने का प्रस्ताव लाया जाता है, तो यह कानूनी चुनौती का सामना कर सकता है। संसद और राज्य विधानसभाओं में भी इस पर गरमागरम बहस की संभावना है।

फिलहाल, इतना तय है कि यह मुद्दा सिर्फ एक गीत का नहीं, बल्कि भारत की विविधता, संविधान और राजनीतिक विचारधाराओं के टकराव का प्रतीक बन चुका है।

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