NGT Action: मध्य प्रदेश के प्रमुख शहरों में लगातार बिगड़ती वायु गुणवत्ता अब न्यायिक हस्तक्षेप के स्तर तक पहुंच चुकी है। भोपाल, इंदौर, ग्वालियर और जबलपुर जैसे शहरों में हवा की हालत गंभीर बनी हुई है। इसी को देखते हुए नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने राज्य सरकार के खिलाफ सख्त रुख अपनाते हुए इसे गंभीर पर्यावरणीय और सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट करार दिया है। एनजीटी की सेंट्रल जोन बेंच, भोपाल ने स्पष्ट किया है कि यदि अब भी ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो स्थिति और भयावह हो सकती है।
NGT Action ने तय की जवाबदेही, 6 सप्ताह में रिपोर्ट का आदेश
याचिकाकर्ता राशिद नूर खान की याचिका पर सुनवाई करते हुए NGT Action ने राज्य सरकार और संबंधित विभागों को कटघरे में खड़ा किया है। जस्टिस शेव कुमार सिंह की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि मध्य प्रदेश में वायु प्रदूषण को लेकर नीतिगत ढिलाई साफ नजर आती है। ट्रिब्यूनल ने एक उच्चस्तरीय संयुक्त समिति का गठन कर 6 सप्ताह के भीतर विस्तृत एक्शन टेकन रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। इस मामले की अगली सुनवाई 18 मार्च 2026 को होगी।
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भोपाल–इंदौर समेत 8 शहर ‘नॉन-अटेनमेंट सिटी’ घोषित
NGT Action के आदेश में यह भी सामने आया कि केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) पहले ही भोपाल, इंदौर, ग्वालियर, जबलपुर, उज्जैन, देवास, सागर और सिंगरौली को “नॉन-अटेनमेंट सिटी” घोषित कर चुका है। इन शहरों में बीते पांच वर्षों से पीएम-10 और पीएम-2.5 का स्तर लगातार राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता मानकों से ऊपर बना हुआ है। यह संकेत देता है कि स्थानीय स्तर पर लागू योजनाएं प्रभावी साबित नहीं हो पाईं।
‘झीलों की नगरी’ भोपाल पर NGT Action
NGT Action ने भोपाल की स्थिति को विशेष रूप से चिंताजनक बताया है। आदेश में कहा गया कि राजधानी भोपाल में पीएम-10 का वार्षिक औसत स्तर 130 से 190 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर तक दर्ज किया गया है, जबकि पीएम-2.5 का स्तर 80 से 100 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर तक पहुंच चुका है। यह आंकड़े तय मानकों से कई गुना अधिक हैं। कभी स्वच्छ हवा और झीलों के लिए पहचाने जाने वाला भोपाल अब सर्दियों में घनी धुंध, कम विजिबिलिटी और “बहुत खराब” से “गंभीर” श्रेणी के AQI से जूझ रहा है। कई मौकों पर शहर का AQI 300 के पार रिकॉर्ड किया गया।
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दिल्ली-एनसीआर मॉडल की तर्ज पर NGT Action की जरूरत
ट्रिब्यूनल ने स्पष्ट किया कि वायु प्रदूषण किसी एक कारण का नतीजा नहीं है। पराली जलाना, निर्माण कार्यों से उड़ती धूल, बढ़ता वाहन उत्सर्जन, खुले में कचरा जलाना, लैंडफिल साइटों में आग, पटाखों का उपयोग और औद्योगिक गतिविधियां मिलकर हालात को बदतर बना रही हैं। एनजीटी ने सवाल उठाया कि जब दिल्ली-एनसीआर में ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान (GRAP) और एयर-शेड आधारित नीति लागू की जा सकती है, तो मध्य प्रदेश में अब तक ऐसा प्रभावी ढांचा क्यों नहीं बनाया गया।
पराली जलाने से बढ़ रहा प्रदूषण का दबाव
एनजीटी ने माना कि भोपाल की हवा को जहरीला बनाने में आसपास के जिलों की बड़ी भूमिका है। रायसेन, सीहोर, विदिशा और नर्मदापुरम (होशंगाबाद) में पराली जलाने की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। वर्ष 2025 की शुरुआत में इन जिलों में 31 हजार से अधिक फसल अवशेष जलाने की घटनाएं दर्ज की गईं, जो देश में सबसे अधिक मानी जा रही हैं। खेतों से उठने वाला धुआं हवा के साथ भोपाल और इंदौर जैसे शहरों तक पहुंचकर पीएम-2.5 के स्तर को तेजी से बढ़ा देता है।
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संयुक्त समिति में ये विभाग होंगे शामिल
NGT Action पर गठित समिति में पर्यावरण विभाग, नगरीय विकास विभाग, परिवहन विभाग, मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (MPPCB), EPCO और CPCB के एक पूर्व वरिष्ठ अधिकारी को शामिल किया गया है। यह समिति प्रदूषण के स्रोतों की पहचान, मौजूदा उपायों की समीक्षा और भविष्य की रणनीति पर विस्तृत रिपोर्ट तैयार करेगी।
स्वास्थ्य संकट की चेतावनी
एनजीटी ने अपने आदेश में साफ कहा है कि वायु प्रदूषण अब केवल पर्यावरण का नहीं, बल्कि सीधे जनस्वास्थ्य से जुड़ा मुद्दा बन चुका है। दमा, फेफड़ों की बीमारी, हृदय रोग और बच्चों पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। ट्रिब्यूनल ने राज्य सरकार से अपेक्षा जताई है कि वह कागजी कार्रवाई से आगे बढ़कर जमीनी स्तर पर सख्त और प्रभावी कदम उठाए, ताकि मध्य प्रदेश के शहरों में रहने वाले लोग स्वच्छ और सुरक्षित हवा में सांस ले सकें।



