उम्र के जिस पड़ाव पर आमतौर पर घर से बाहर एक कदम रखना भी चुनौती बन जाता है, उस उम्र में हरियाणा में फरीदाबाद के एक बुजुर्ग ने आस्था के दम पर मिसाल कायम कर दी है। चंदर 250 किलोमीटर कांवड़ यात्रा की यह कहानी अब पूरे इलाके में चर्चा का विषय बनी हुई है। 85 वर्षीय चंदर हरिद्वार से कांवड़ उठाकर पैदल ही अपने पैतृक गांव सागरपुर तक पहुंचे और रास्ते में किसी तरह की मदद नहीं ली।
हरिद्वार से सागरपुर तक अकेले तय किया सफर
चंदर ने बताया कि इस बार भी वह हरिद्वार पहुंचे और गंगाजल भरकर अपने गांव की ओर पैदल निकल पड़े। करीब 250 किलोमीटर के इस लंबे सफर में उनके कदम न तो थके और न ही उनका हौसला डगमगाया। रास्ते में जहां ज्यादातर युवा कांवड़िए थकान और मौसम की मार से जूझते नजर आते हैं, वहीं चंदर की चाल में कहीं कोई कमी नहीं दिखी। यह सुनकर लोग हैरान रह जाते हैं कि इतनी उम्र में भी उन्होंने यह दूरी बिना किसी सहारे के पूरी की।
भोले बाबा के बुलावे पर निकले घर से
चंदर का कहना है कि वह चाहते तो घर पर आराम कर सकते थे, लेकिन उन्हें लगा कि भोले बाबा का बुलावा आ गया है, इसलिए वह हरिद्वार की ओर निकल पड़े। उनके मुताबिक, यह आस्था का सवाल है, उम्र का नहीं। यही सोच उन्हें हर साल इस यात्रा के लिए प्रेरित करती है और इस बार भी उन्होंने अपने संकल्प को पूरा करके दिखाया।
गांव पहुंचने पर परिवार में जश्न का माहौल
जैसे ही चंदर अपने गांव सागरपुर पहुंचे, परिजनों में खुशी की लहर दौड़ गई। घरवालों और आसपास के लोगों ने ढोल-नगाड़ों के साथ उनका जोरदार स्वागत किया। फूल-मालाओं से लदे चंदर की यह वापसी गांव के लिए किसी उत्सव से कम नहीं थी। स्थानीय लोगों का कहना है कि 85 साल की उम्र में यह यात्रा पूरी करना आसान काम नहीं, और चंदर ने युवाओं के लिए भी एक प्रेरणा पेश की है।
सावन में हर साल निभाते हैं यह परंपरा
बताया जा रहा है कि चंदर सिर्फ इस बार नहीं, बल्कि पिछले कई वर्षों से लगातार यह कांवड़ यात्रा करते आ रहे हैं। उनकी यह आस्था अब क्षेत्र में चर्चा का विषय बन चुकी है। लोग उन्हें देखकर यही कहते नजर आ रहे हैं कि सच्ची भक्ति में न उम्र आड़े आती है और न ही दूरी। चंदर की यह यात्रा एक बार फिर साबित करती है कि इरादे मजबूत हों तो कोई भी सफर लंबा नहीं लगता।


