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Lokhitkranti > ताज़ा खबरे > Lipulekh Dispute: कैलाश मार्ग पर फिर तनातनी, लिपुलेख विवाद ने भारत-नेपाल संबंधों में बढ़ाई हलचल
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Lipulekh Dispute: कैलाश मार्ग पर फिर तनातनी, लिपुलेख विवाद ने भारत-नेपाल संबंधों में बढ़ाई हलचल

Lokhit Kranti
Last updated: 2026-05-03 11:53 pm
Lokhit Kranti Published 2026-05-03
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Lipulekh Dispute
Lipulekh Dispute: कैलाश मार्ग पर फिर तनातनी, लिपुलेख विवाद ने भारत-नेपाल संबंधों में बढ़ाई हलचल
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Lipulekh Dispute: भारत और नेपाल के बीच एक बार फिर सीमा विवाद को लेकर तनाव बढ़ता नजर आ रहा है। इस बार मामला कैलाश मानसरोवर यात्रा के मार्ग से जुड़ा है, जिस पर नेपाल ने आपत्ति दर्ज कराते हुए अपने दावे को दोहराया है। नेपाल की ओर से उठाए गए इस मुद्दे ने न केवल कूटनीतिक हलकों में हलचल पैदा की है, बल्कि यह भी संकेत दिया है कि दोनों देशों के बीच लंबित सीमा विवाद अभी पूरी तरह सुलझा नहीं है।

Contents
नेपाल का दावा और कड़ा रुखभारत का जवाब – ‘रुख स्पष्ट और स्थिर’यात्रा मार्ग और रणनीतिक महत्वक्या है पूरा विवाद?2020 में बढ़ा था विवादसंवाद का रास्ता अभी भी खुलारिश्तों पर असर या संतुलन की कोशिश?

नेपाल का दावा और कड़ा रुख

नेपाल सरकार ने लिपुलेख दर्रा (Lipulekh Dispute) के रास्ते से कैलाश मानसरोवर यात्रा आयोजित करने की योजना पर आपत्ति जताई है। काठमांडू का कहना है कि इस क्षेत्र को लेकर उससे कोई परामर्श नहीं किया गया, जबकि यह उसका अभिन्न हिस्सा है। नेपाल के विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में लिम्पियाधुरा, कालापानी और लिपुलेख को महाकाली नदी के पूर्व स्थित नेपाल का हिस्सा बताया है। इस दावे के समर्थन में उसने सुगौली संधि 1816 का हवाला दिया है। नेपाल ने यह भी कहा कि उसने भारत और चीन दोनों को अपने रुख से अवगत करा दिया है और पहले भी इस क्षेत्र में सड़क निर्माण और अन्य गतिविधियों पर आपत्ति जताई जा चुकी है।

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भारत का जवाब – ‘रुख स्पष्ट और स्थिर’

भारत ने नेपाल के दावों को खारिज करते हुए अपना पक्ष दोहराया है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि भारत का रुख इस मुद्दे पर हमेशा से स्पष्ट और स्थिर रहा है। उन्होंने बताया कि कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए लिपुलेख दर्रा (Lipulekh Dispute) का उपयोग 1954 से लगातार होता आ रहा है और इसे किसी नई या विवादित पहल के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। भारत ने यह भी स्पष्ट किया कि नेपाल के दावे ऐतिहासिक तथ्यों और प्रमाणों पर आधारित नहीं हैं और इस तरह के एकतरफा विस्तार को स्वीकार नहीं किया जा सकता।

यात्रा मार्ग और रणनीतिक महत्व

भारत ने हाल ही में घोषणा की थी कि इस वर्ष कैलाश मानसरोवर यात्रा जून से अगस्त के बीच आयोजित की जाएगी। इसके लिए दो प्रमुख मार्ग तय किए गए हैं उत्तराखंड का लिपुलेख दर्रा और नाथू ला दर्रा। लिपुलेख दर्रा (Lipulekh Dispute) न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि इसका रणनीतिक और आर्थिक महत्व भी काफी बड़ा है। यह क्षेत्र भारत, नेपाल और तिब्बत के संगम के पास स्थित है, जिससे यह सुरक्षा और व्यापार दोनों के लिहाज से संवेदनशील बन जाता है।

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क्या है पूरा विवाद?

लिपुलेख विवाद मूल रूप से उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में स्थित कालापानी-लिपुलेख-लिम्पियाधुरा क्षेत्र से जुड़ा है। नेपाल का दावा है कि महाकाली नदी का वास्तविक उद्गम लिम्पियाधुरा में है, इसलिए नदी के पूर्व का पूरा क्षेत्र उसका हिस्सा है। वहीं, भारत का कहना है कि यह इलाका ऐतिहासिक रूप से उसके प्रशासनिक नियंत्रण में रहा है और यहां लंबे समय से भारतीय संस्थाएं काम करती रही हैं। करीब 400 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर भारत का प्रभावी नियंत्रण है।

2020 में बढ़ा था विवाद

दोनों देशों के बीच यह मुद्दा भारत-नेपाल सीमा विवाद 2020 के दौरान ज्यादा चर्चा में आया था। उस समय भारत ने धारचूला से लिपुलेख तक सड़क का उद्घाटन किया था, जिसके बाद नेपाल ने नया राजनीतिक नक्शा जारी कर इस क्षेत्र को अपने हिस्से में दिखाया था। तब से यह विवाद (Lipulekh Dispute) समय-समय पर सामने आता रहा है और अब कैलाश यात्रा के बहाने एक बार फिर चर्चा में है।

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संवाद का रास्ता अभी भी खुला

हालांकि दोनों देशों के बीच मतभेद बने हुए हैं, लेकिन बातचीत की गुंजाइश अभी खत्म नहीं हुई है। भारत ने स्पष्ट किया है कि वह नेपाल के साथ सभी मुद्दों पर रचनात्मक संवाद के लिए तैयार है। नेपाल ने भी कहा है कि वह कूटनीतिक माध्यमों और ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर इस विवाद (Lipulekh Dispute) का समाधान चाहता है।

रिश्तों पर असर या संतुलन की कोशिश?

भारत और नेपाल के संबंध ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आर्थिक रूप से बेहद मजबूत रहे हैं। ऐसे में इस तरह के विवाद दोनों देशों के लिए चुनौती जरूर बनते हैं, लेकिन कूटनीतिक संवाद के जरिए समाधान की उम्मीद भी बनी रहती है। कैलाश मानसरोवर यात्रा जैसे धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व के मुद्दे पर सहमति बनाना दोनों देशों के लिए जरूरी माना जा रहा है। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि यह विवाद किस दिशा में आगे बढ़ता है और क्या दोनों देश मिलकर इसका शांतिपूर्ण समाधान निकाल पाते हैं।

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