Savarkar Controversy Explained: RSS प्रमुख मोहन भागवत के हालिया बयान ने भारतीय राजनीति में एक बार फिर इतिहास, राष्ट्रवाद और विचारधारा की बहस को तेज कर दिया है। वीर सावरकर को ‘सच्चा देशभक्त’ बताकर उनके योगदान की सराहना करना केवल एक वैचारिक टिप्पणी नहीं रहा, बल्कि यह बयान सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच नई राजनीतिक जंग की वजह बन गया है।
संसद से लेकर सोशल मीडिया तक एक ही सवाल गूंज रहा है कि, क्या सावरकर महान क्रांतिकारी थे या फिर ब्रिटिश शासन से समझौता करने वाले नेता?
Savarkar Controversy Explained: मोहन भागवत का बयान और सियासी भूचाल
मोहन भागवत ने एक कार्यक्रम में कहा कि वीर सावरकर ने अपना पूरा जीवन राष्ट्र के लिए समर्पित किया और उन्हें केवल कुछ चुनिंदा घटनाओं के आधार पर आंकना ऐतिहासिक अन्याय है। इस बयान के बाद विपक्ष ने इसे इतिहास को “एकतरफा ढंग से पेश करने” की कोशिश बताया।
कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और वाम दलों ने तुरंत प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि सावरकर के पूरे जीवन पर सवाल उठाना जरूरी है, न कि सिर्फ उनकी विचारधारा को महिमामंडित करना।
Savarkar Controversy Explained: विपक्ष का सवाल – देशभक्त या ब्रिटिश समर्थक?
विपक्ष का सबसे बड़ा हमला सावरकर की दया याचिकाओं को लेकर है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि अगर सावरकर इतने बड़े क्रांतिकारी थे, तो उन्होंने अंडमान की सेल्युलर जेल से रिहाई के लिए अंग्रेजों को बार-बार माफी पत्र क्यों लिखे?
विपक्ष का दावा है कि इन याचिकाओं में सावरकर ने न केवल क्षमा मांगी, बल्कि यह आश्वासन भी दिया कि वे भविष्य में ब्रिटिश शासन के खिलाफ किसी गतिविधि में हिस्सा नहीं लेंगे। विपक्ष के अनुसार, यह क्रांतिकारी विचारधारा से सीधा समझौता था।
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Savarkar Controversy Explained: ‘ब्रिटिश रत्न’ शब्द कैसे बना सियासी हथियार?
मोहन भागवत के बयान के बाद विपक्षी नेताओं ने सावरकर के लिए “ब्रिटिश रत्न” जैसे शब्दों का इस्तेमाल शुरू कर दिया। आरोप लगाया गया कि रिहाई के बाद सावरकर को ब्रिटिश सरकार से पेंशन और कुछ सुविधाएं मिलीं।
हालांकि कई इतिहासकार मानते हैं कि ‘ब्रिटिश रत्न’ नाम का कोई आधिकारिक सम्मान कभी नहीं दिया गया, लेकिन राजनीति में प्रतीकों और शब्दों की ताकत तथ्य से ज्यादा असरदार होती है। यही वजह है कि यह शब्द अब विपक्ष के लिए एक सियासी तंज बन चुका है।
Savarkar Controversy Explained: दया याचिकाएं – मजबूरी, रणनीति या आत्मसमर्पण?
यह विवाद का सबसे संवेदनशील और निर्णायक पहलू है। विपक्ष पूछता है कि, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद या सुभाष चंद्र बोस ने कभी अंग्रेजों से माफी नहीं मांगी, तो सावरकर ने क्यों?
वहीं, RSS और भाजपा समर्थकों का तर्क बिल्कुल अलग है। उनका कहना है कि सावरकर की दया याचिकाएं आत्मसमर्पण नहीं, बल्कि रणनीतिक कदम थीं। अंडमान की जेल में रहते हुए न तो संगठन खड़ा किया जा सकता था और न ही वैचारिक संघर्ष आगे बढ़ाया जा सकता था। बाहर आकर समाज सुधार, लेखन और वैचारिक आंदोलन को आगे बढ़ाना ज्यादा प्रभावी था।
Savarkar Controversy Explained: भाजपा और संघ का पलटवार
भाजपा ने विपक्ष पर इतिहास को ‘राजनीतिक चश्मे’ से देखने का आरोप लगाया है। पार्टी नेताओं का कहना है कि दशकों तक नेहरू-गांधी परिवार की राजनीति ने सावरकर की छवि को जानबूझकर नकारात्मक रूप में पेश किया।
RSS का तर्क है कि सावरकर का जीवन केवल दया याचिकाओं तक सीमित नहीं था। वे क्रांतिकारी, लेखक, कवि, समाज सुधारक और हिंदुत्व विचारधारा के प्रमुख स्तंभ थे। कुछ दस्तावेजों को चुनकर पूरे जीवन को कठघरे में खड़ा करना ऐतिहासिक अन्याय है।
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Savarkar Controversy Explained: इतिहास बनाम राजनीति की जंग
यह विवाद अब सिर्फ इतिहास की व्याख्या तक सीमित नहीं रहा। सावरकर का नाम आते ही हिंदुत्व, राष्ट्रवाद और मौजूदा राजनीतिक ध्रुवीकरण सामने आ जाता है।
विपक्ष इसे भाजपा के वैचारिक एजेंडे से जोड़ता है, जबकि भाजपा इसे इतिहास के पुनर्मूल्यांकन की प्रक्रिया बताती है। दोनों पक्षों के लिए सावरकर अब एक ऐतिहासिक व्यक्ति से ज्यादा राजनीतिक प्रतीक बन चुके हैं।
Savarkar Controversy Explained: चुनावी राजनीति में सावरकर क्यों अहम?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आते हैं, वैसे-वैसे सावरकर जैसे मुद्दे और उग्र होते जाते हैं। सावरकर भाजपा के कोर वोटबैंक से जुड़े हुए हैं, जबकि विपक्ष उन्हें मुद्दा बनाकर भाजपा को वैचारिक रूप से घेरने की कोशिश करता है। यही कारण है कि हर कुछ समय में सावरकर की दया याचिकाएं, पेंशन और ब्रिटिश संबंधों पर बहस फिर से सुर्खियों में आ जाती है।
Savarkar Controversy Explained: सोशल मीडिया पर दो ध्रुव
सोशल मीडिया पर यह बहस पूरी तरह ध्रुवीकृत हो चुकी है। एक तरफ ‘वीर सावरकर’ और ‘महान राष्ट्रभक्त’ जैसे ट्रेंड चल रहे हैं, तो दूसरी तरफ ‘माफीवीर’ जैसे शब्दों से आलोचना हो रही है। नई पीढ़ी के लिए यह बहस अब इतिहास की किताबों से ज्यादा सोशल मीडिया नैरेटिव पर निर्भर होती जा रही है।
Savarkar Controversy Explained: आखिर असली सवाल क्या है?
असल सवाल यह नहीं है कि सावरकर ने अंग्रेजों से क्या लिखा या क्या लिया। बड़ा सवाल यह है कि आज के भारत में इतिहास को किस नजरिए से देखा जा रहा है।
क्या किसी ऐतिहासिक व्यक्ति को केवल एक घटना से आंकना सही है? या फिर उनके पूरे जीवन, परिस्थितियों और योगदान पर संतुलित बहस जरूरी है?
मोहन भागवत के बयान ने यह साफ कर दिया है कि सावरकर की विरासत पर सियासी जंग अभी थमने वाली नहीं है। आने वाले दिनों और चुनावों में इसकी गूंज और तेज सुनाई देगी।
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