India US Trade Deal: हिमालयी राज्यों के सेब किसानों के बीच बेचैनी लगातार बढ़ती जा रही है। किसानों को आशंका है कि India US Trade Deal ढांचे के तहत अमेरिका से आयात होने वाले सस्ते फलों के कारण उनकी आजीविका पर गहरा संकट आ सकता है। किसान संगठनों का कहना है कि यदि आयात शुल्क में प्रस्तावित कटौती लागू होती है, तो घरेलू सेब बाजार को भारी नुकसान झेलना पड़ेगा और लाखों किसान परिवार आर्थिक संकट में फंस सकते हैं।
सेब उद्योग को तीसरा बड़ा झटका- किसान संगठन
दो दर्जन से अधिक किसान संगठनों के संयुक्त मंच ‘संयुक्त किसान मंच’ के संयोजक हरीश चौहान ने कहा कि यह भारतीय सेब अर्थव्यवस्था के लिए तीसरा बड़ा झटका साबित हो सकता है। इससे पहले यूरोपीय संघ और न्यूजीलैंड के साथ हुए व्यापार समझौतों से भी किसानों को नुकसान झेलना पड़ा है। India US Trade Deal समझौतों के तहत सेब और अन्य फलों पर आयात शुल्क 50 प्रतिशत से घटाकर 20 प्रतिशत तक कर दिया गया, जिससे विदेशी फलों की कीमतें भारतीय बाजार में काफी कम हो गईं।
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आयात शुल्क में कटौती से बढ़ेगा दबाव
किसान नेताओं का कहना है कि सरकार सेब पर आयात शुल्क को और घटाकर 25 प्रतिशत करने की बात कर रही है। इसके साथ ही न्यूनतम आयात मूल्य (एमआईपी) 80 रुपये प्रति किलो तय किया गया है। हरीश चौहान के अनुसार, अमेरिका और न्यूजीलैंड जैसे देशों के किसानों से भारतीय सेब उत्पादक प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकते। आयात शुल्क में कमी से विदेशी सेब 15 से 20 रुपये प्रति किलो तक सस्ते हो सकते हैं, जिससे घरेलू सेब की कीमतें गिरना तय है।
प्रीमियम सेबों पर सबसे ज्यादा असर
चौहान ने बताया कि वर्तमान में अमेरिका से आने वाले 20 किलोग्राम के एक बॉक्स सेब पर लगने वाली ड्यूटी के कारण उसकी कीमत भारतीय बाजार में 2500 से 2700 रुपये के बीच होती है। लेकिन शुल्क घटने और अन्य लागत कम होने के बाद वही सेब लगभग आधी कीमत पर बिक सकता है। इससे भारतीय प्रीमियम सेबों को सीधा नुकसान होगा और किसानों को उचित दाम नहीं मिल पाएंगे।
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सेब उत्पादन और आजीविका का बड़ा आधार
भारत में हर साल करीब 2.5 मिलियन टन सेब का उत्पादन होता है, जो वैश्विक उत्पादन का लगभग दो प्रतिशत है। इसमें से करीब 75 प्रतिशत उत्पादन कश्मीर से आता है। सेब उद्योग से देश को सालाना 12 हजार करोड़ रुपये से अधिक की आय होती है। जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड प्रमुख सेब उत्पादक राज्य हैं, जहां यह फसल लाखों परिवारों की रोजी-रोटी का आधार है।
कश्मीर में लाखों परिवारों पर असर की आशंका
जम्मू-कश्मीर में सेब उद्योग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सात लाख से अधिक परिवारों को रोजगार देता है। शोपियां के सेब किसान मोहम्मद अब्बास का कहना है कि वे पहले से ही जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से जूझ रहे हैं। बाढ़, कम बर्फबारी, अनियमित बारिश और नई बीमारियों ने लागत बढ़ा दी है। महंगे कीटनाशकों और स्वास्थ्य समस्याओं के बीच अब सस्ते आयातित सेब उनकी मुश्किलें और बढ़ा देंगे।
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सरकार का पक्ष और किसानों की चिंता
हाल ही में India US Trade Deal ने परस्पर लाभकारी व्यापार को लेकर एक अंतरिम फ्रेमवर्क की घोषणा की है। साझा बयान के अनुसार, यह India US Trade Deal बड़े द्विपक्षीय व्यापार समझौते की दिशा में पहला कदम है, जिसमें कई अमेरिकी कृषि और खाद्य उत्पादों पर टैरिफ कम या खत्म किए जाने की बात कही गई है। केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने भरोसा दिलाया है कि इससे संवेदनशील घरेलू उत्पादों को नुकसान नहीं होगा और किसानों के हितों का ध्यान रखा गया है।
भरोसे के बावजूद दूर नहीं हुई आशंका
हालांकि सरकार के आश्वासन के बावजूद हिमाचल से लेकर कश्मीर तक किसानों का डर कम नहीं हुआ है। उनका मानना है कि जब आयातित सेब बड़ी मात्रा में बाजार में आएंगे, तो घरेलू कीमतों में 50 प्रतिशत तक गिरावट आ सकती है। किसानों का कहना है कि विदेशी सेब भले ही पोषण में बेहतर न हों, लेकिन उनकी चमक और रंग के कारण उपभोक्ता उन्हें अधिक पसंद करते हैं।
प्रधानमंत्री से की सुरक्षा की मांग
कश्मीर के किसान संगठनों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर आयातित सेब पर 100 प्रतिशत शुल्क लगाने की मांग की है। उनका कहना है कि हर साल किसी न किसी देश से सेब आयात होने से घरेलू उद्योग को नई चुनौती मिलती है। किसानों का साफ कहना है कि अगर समय रहते सुरक्षा उपाय नहीं किए गए, तो सेब उत्पादक राज्यों की ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर इसका गंभीर असर पड़ेगा।
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