Korean mobile game addiction: अगर आपके घर में बच्चा घंटों मोबाइल पर गेम खेलता है, तो गाजियाबाद से आई यह खबर आपको सोचने पर मजबूर कर देगी। यह मामला सिर्फ मोबाइल गेमिंग का नहीं, बल्कि उस खामोश खतरे का है, जो धीरे-धीरे बच्चों के दिमाग पर कब्जा कर लेता है। गाजियाबाद की एक हाई-राइज सोसाइटी में तीन नाबालिग बहनों की सामूहिक मौत ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है।
एक साथ बुझ गईं तीन मासूम जिंदगियां
दिल्ली से सटे गाजियाबाद में रहने वाली तीन सगी बहनें 15 वर्षीय निशिका, 13 वर्षीय प्राची और 11 वर्षीय पाखी एक साथ इस दुनिया को अलविदा कह गईं। उम्र इतनी कम थी कि सपने देखना भी अभी शुरू ही हुआ था। लेकिन एक ऑनलाइन कोरियन टास्क-बेस्ड मोबाइल गेम ने उनके सपनों को हमेशा के लिए खत्म कर दिया। घटना के बाद पूरी सोसाइटी में सन्नाटा पसरा रहा। किसी को यकीन नहीं हो रहा था कि हंसती-खेलती बच्चियां ऐसा खौफनाक कदम उठा सकती हैं।
दो साल से ज्यादा समय से गेम की गिरफ्त में
परिजनों के मुताबिक, तीनों बहनें पिछले दो से तीन सालों से एक खास तरह के ऑनलाइन गेम से जुड़ी हुई थीं। यह गेम सामान्य एंटरटेनमेंट गेम्स जैसा नहीं था। इसमें बच्चों को लगातार टास्क दिए जाते थे। टास्क पूरे होने पर तारीफ और अपनापन दिखाया जाता था, लेकिन नाकाम होने पर डर, दबाव और मानसिक तनाव बढ़ाया जाता था। धीरे-धीरे यह गेम उनकी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन गया और असली दुनिया उनसे दूर होती चली गई।
रोकने की कोशिश हुई, लेकिन देर हो चुकी थी
परिवार को जब बच्चों की मोबाइल पर बढ़ती निर्भरता का अंदेशा हुआ, तो मोबाइल छीना गया, पाबंदियां लगाई गईं और समझाने की कोशिश भी की गई। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। बच्चियां उस वर्चुअल दुनिया में इतनी गहराई तक फंस चुकी थीं कि हर रोक- टोक उन्हें खतरे की तरह लगने लगी।
मानसिक नियंत्रण का शक
विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला सिर्फ गेमिंग एडिक्शन का नहीं, बल्कि साइकोलॉजिकल मैनिपुलेशन का भी हो सकता है। ऐसे टास्क-बेस्ड गेम्स में बच्चों को धीरे-धीरे मानसिक रूप से कंट्रोल किया जाता है। पहले आसान टास्क, फिर भावनात्मक जुड़ाव और बाद में डर पैदा करने वाले टास्क दिए जाते हैं। बच्चों को यह विश्वास दिलाया जाता है कि अगर टास्क पूरा नहीं हुआ, तो कुछ बहुत बुरा होगा। यही डर उनके फैसलों को नियंत्रित करने लगता है।
कोरियन कल्चर की ओर बढ़ता झुकाव
तीनों बच्चियों का कोरियन कल्चर की तरफ झुकाव भी इस मामले में अहम भूमिका निभाता दिख रहा है। के-पॉप, के-ड्रामा और कोरियन लाइफस्टाइल से वे इस कदर प्रभावित थीं कि असली जिंदगी उन्हें नीरस लगने लगी थी। परिजनों के अनुसार, बच्चियां कोरिया जाने और वहां की जिंदगी जीने की बातें करती थीं। यह फैनडम नहीं, बल्कि एक तरह का मानसिक पलायन बन चुका था।
माता-पिता को नहीं था खतरे का अंदाजा
बच्चियों के पिता का कहना है कि उन्हें कभी नहीं लगा था कि मोबाइल गेम इतना बड़ा खतरा बन सकता है। बच्चियों के व्यवहार में बदलाव जरूर दिखा, लेकिन उसे उम्र का असर समझकर नजरअंदाज कर दिया गया। किसी को अंदाजा नहीं था कि चुप्पी के पीछे इतना गहरा तनाव छिपा है।
डिजिटल दुनिया का खामोश जाल
इस तरह के मामलों की सबसे डरावनी बात यह है कि सब कुछ बहुत शांति से होता है। बच्चा मोबाइल पर चुपचाप बैठा रहता है और माता-पिता निश्चिंत रहते हैं। लेकिन स्क्रीन के उस पार कौन बात कर रहा है, क्या निर्देश दिए जा रहे हैं और बच्चे पर क्या असर पड़ रहा है यह किसी को पता नहीं चलता। कई बार बच्चों को डराया जाता है या भावनात्मक रूप से ब्लैकमेल किया जाता है, जिससे वे कुछ भी साझा करने से डरने लगते हैं।
मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर
मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, लंबे समय तक गेमिंग से दिमाग का रिवॉर्ड सिस्टम प्रभावित होता है। असली दुनिया की खुशियां फीकी लगने लगती हैं और वर्चुअल जीत ही सब कुछ बन जाती है। यही स्थिति आगे चलकर डिप्रेशन और आत्मघाती विचारों को जन्म देती है।
सबकी जिम्मेदारी बनती है समाधान
यह घटना सिर्फ एक परिवार का दर्द नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए चेतावनी है। माता-पिता को बच्चों से संवाद बढ़ाना होगा। स्कूलों को डिजिटल सेफ्टी और मेंटल हेल्थ पर गंभीरता से काम करना होगा। वहीं सरकार और टेक कंपनियों को ऐसे संदिग्ध गेम्स पर कड़ी निगरानी रखनी होगी।
जाते-जाते लिख गईं ‘सॉरी’
सबसे दिल दहला देने वाली बात यह है कि तीनों बच्चियों ने जाते-जाते अपने माता-पिता के लिए ‘सॉरी’ लिखा। यह शब्द बताता है कि वे कितनी अकेली और टूट चुकी थीं।
हर घर की कहानी बन सकती है यह घटना
गाजियाबाद की यह घटना किसी एक शहर या परिवार तक सीमित नहीं है। यह हर उस घर की कहानी हो सकती है, जहां बच्चा घंटों मोबाइल स्क्रीन में खोया रहता है। आज सतर्क नहीं हुए, तो कल पछतावे के सिवा कुछ नहीं बचेगा।



