Himalayan Climate Change: हिमालय, जिसे भारत की जलवायु और जल सुरक्षा की आधारशिला माना जाता है, इन दिनों एक असामान्य और चिंताजनक दौर से गुजर रहा है। केदार घाटी सहित मध्य हिमालय के कई इलाकों में जनवरी के तीसरे सप्ताह तक बर्फबारी न होना वैज्ञानिकों और स्थानीय लोगों- दोनों के लिए गहरी चिंता का विषय बन गया है। आमतौर पर इस समय तक मंदाकिनी नदी के उद्गम क्षेत्र और आसपास की ऊंची चोटियां बर्फ की मोटी परत से ढकी रहती थीं, लेकिन इस वर्ष पहाड़ सूखे और नंगे नजर आ रहे हैं।
Himalayan Climate Change से बड़ा विचलन
विशेषज्ञों के अनुसार जनवरी में बर्फ का न गिरना सामान्य मौसमी उतार-चढ़ाव नहीं है। यह पश्चिमी विक्षोभों की कमजोरी, लगातार बढ़ते औसत तापमान और बदलते मौसम चक्र का नतीजा है। आमतौर पर सर्दियों में हिमालय में सक्रिय पश्चिमी विक्षोभ भारी हिमपात लेकर आते हैं, लेकिन इस बार उनकी सक्रियता बेहद सीमित रही। परिणामस्वरूप ऊंचाई वाले क्षेत्र, जहां हर साल गहरी बर्फ जमा रहती थी, इस बार सूखे पहाड़ों में तब्दील हो गए हैं।
हिमनदों पर पड़ता सीधा प्रभाव
बर्फ की कमी का सबसे बड़ा असर ग्लेशियरों पर पड़ रहा है। वैज्ञानिक बताते हैं कि जब तापमान थोड़ा भी बढ़ता है, तो बर्फ की जगह बारिश होने लगती है। इससे Himalayan Climate Change है और उनका पिघलना तेज हो जाता है। केदार घाटी में मंदाकिनी नदी और उसकी सहायक धाराओं के जलस्तर में गिरावट के संकेत मिलने लगे हैं। आने वाले महीनों में इसका असर Himalayan Climate Change पेयजल, सिंचाई और जलविद्युत परियोजनाओं पर पड़ सकता है।
कृषि और पशुपालन पर बढ़ता दबाव
मौसम में इस Himalayan Climate Change का सबसे पहला असर स्थानीय समुदायों पर दिख रहा है। पर्वतीय क्षेत्रों में सेब, राजमा और अन्य पारंपरिक फसलों की पैदावार प्रभावित हो रही है। बर्फबारी कम होने से मिट्टी में नमी घट रही है, जिससे खेती करना कठिन होता जा रहा है। वहीं, पारंपरिक चरागाह सूखने लगे हैं, जिससे पशुपालन पर निर्भर परिवारों की आजीविका खतरे में पड़ गई है। केदार घाटी के निचले इलाकों में भी समय पर बारिश न होने से काश्तकारों की चिंता बढ़ गई है।
पर्यटन व्यवसाय पर भी असर
सर्दियों में बर्फ देखने के लिए केदारनाथ क्षेत्र, तुंगनाथ घाटी, देवरियाताल और कार्तिक स्वामी जैसे स्थानों पर बड़ी संख्या में पर्यटक आते हैं। लेकिन इस वर्ष बर्फबारी न होने से पर्यटक निराश लौट रहे हैं। इसका सीधा असर होटल व्यवसाय, स्थानीय गाइड, टैक्सी चालकों और अन्य पर्यटन से जुड़े लोगों की आमदनी पर पड़ा है। पहाड़ी अर्थव्यवस्था में पर्यटन की अहम भूमिका होती है और मौसम की इस अनिश्चितता ने उसे भी कमजोर कर दिया है।
तेजी से बढ़ता जलवायु खतरा
वैज्ञानिकों के अनुसार सबसे चिंताजनक बात यह है कि यह बदलाव बहुत तेजी से हो रहा है। यदि यही रुझान जारी रहा, तो आने वाले दशकों में हिमालय के कई हिस्से स्थायी रूप से बर्फविहीन हो सकते हैं। यह संकट केवल प्राकृतिक नहीं, बल्कि मानव गतिविधियों से भी जुड़ा है। बढ़ता कार्बन उत्सर्जन, वनों की अंधाधुंध कटाई, अनियंत्रित निर्माण कार्य, सड़क चौड़ीकरण और सुरंगों ने हिमालय को बेहद संवेदनशील बना दिया है।
Latest News Update Uttar Pradesh News,उत्तराखंड की ताज़ा ख़बर
विशेषज्ञों की गंभीर चेतावनी
पर्यावरणविदों का कहना है कि Himalayan Climate Change का सबसे गहरा असर हिमालयी क्षेत्र पर पड़ रहा है। औद्योगिक गतिविधियों, बढ़ती वनाग्नि और वायुमंडलीय असंतुलन के कारण मौसम चक्र तेजी से बदल रहा है। कुछ विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि मनुष्य ने प्रकृति के साथ संतुलन बिगाड़ दिया है। बुग्यालों में बढ़ता प्लास्टिक कचरा, प्रदूषण और वैश्विक स्तर पर सैन्य गतिविधियों से होने वाला उत्सर्जन इस संकट को और बढ़ा रहा है।
उत्तराखंड की बड़ी खबर देखने के लिये क्लिक करे
आने वाले समय के लिए चेतावनी
जनवरी में बर्फविहीन हिमालय केवल एक मौसम संबंधी खबर नहीं है, बल्कि भविष्य के लिए गंभीर संकेत है। यदि समय रहते विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन नहीं बनाया गया, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए हिमालय की बर्फ, ग्लेशियर और नदियां केवल किताबों और तस्वीरों तक सीमित रह सकती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि टिकाऊ विकास, पर्यावरण संरक्षण और जिम्मेदार नीतियों के बिना इस संकट से निपटना संभव नहीं होगा। हिमालय को बचाना केवल पर्वतीय क्षेत्रों की नहीं, बल्कि पूरे देश की जिम्मेदारी है।



