Javed Akhtar Birthday: बॉलीवुड के दिग्गज गीतकार, पटकथा लेखक और राज्यसभा के पूर्व सांसद जावेद अख्तर सिर्फ अपनी कलम के लिए नहीं, बल्कि अपनी निडर सोच और बेबाक बयानों के लिए भी जाने जाते हैं। ‘शोले’, ‘दीवार’, ‘डॉन’, ‘मिस्टर इंडिया’ जैसी फिल्मों के अमर संवाद लिखने वाले जावेद अख्तर ने हमेशा धर्म, राजनीति, कट्टरता, महिलाओं की आज़ादी और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर खुलकर राय रखी। आज उनके 81वें जन्मदिन पर जानते हैं ऐसे ही कुछ बयान, जिन्होंने देशभर में बहस, विवाद और आत्ममंथन को जन्म दिया।
भारत का विभाजन एक ऐतिहासिक भूल
जावेद अख्तर (Javed Akhtar) कई बार कह चुके हैं कि 1947 का बंटवारा ऐतिहासिक भूल था। 2023 में लाहौर के फैज फेस्टिवल में उन्होंने कहा कि पाकिस्तान हिंदुस्तान से ही निकला और विभाजन ने अनावश्यक दुश्मनी पैदा की। उनके मुताबिक भारत और पाकिस्तान के लोग सांस्कृतिक रूप से एक ही जड़ों से जुड़े हैं, लेकिन राजनीति ने दीवारें खड़ी कर दीं।
भारत में नास्तिक होना सबसे मुश्किल
बरखा दत्त के पॉडकास्ट में जावेद अख्तर ने खुद (Javed Akhtar) को ‘मुस्लिम नास्तिक’ बताया। उन्होंने कहा, ‘धर्म नहीं मानता, लेकिन पहचान मुस्लिम ही रह जाती है। नास्तिकों की हालत समलैंगिकों जैसी है।’ उनका कहना था कि मुस्लिम उन्हें अमर नाम देने को कहते हैं, हिंदू ‘पाकिस्तान जाओ’ चिल्लाते हैं, यानी दोनों तरफ से नफरत मिलती है।
पाकिस्तान में सेकुलरिज्म लगभग खत्म
भारत-पाक रिश्तों पर बोलते हुए जावेद अख्तर ने कहा कि पाकिस्तान में धर्मनिरपेक्षता नाम मात्र की रह गई है। उन्होंने अल्पसंख्यकों की स्थिति का हवाला देते हुए कहा कि कट्टरवाद वहां सामाजिक ताने-बाने पर हावी हो चुका है।
‘पाकिस्तान और नरक में से नरक चुनूंगा’ – जावेद अख्तर
मई 2025 में संजय राउत की किताब के विमोचन पर जावेद अख्तर ने तीखा बयान देते हुए कहा, ‘एक तरफ कहा जाता है तुम काफिर हो, नरक जाओ; दूसरी तरफ कहा जाता है जिहादी हो, पाकिस्तान जाओ। ऐसे में अगर चुनना हो तो मैं नरक चुनूंगा।’ यह बयान राजनीतिक गलियारों से लेकर सोशल मीडिया तक छा गया।

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लाउडस्पीकर पर अजान बंद होनी चाहिए
2020 में उन्होंने ट्वीट कर कहा कि अजान से उन्हें आपत्ति नहीं, लेकिन लाउडस्पीकर दूसरों के लिए असुविधा है। उनका तर्क था कि ध्वनि प्रदूषण एक सामाजिक समस्या है और धर्म इसके ऊपर नहीं हो सकता। इस बयान पर खूब विवाद हुआ।
धर्म ने इंसान को डरपोक बनाया
2024 में इंडियन एक्सप्रेस के एक कार्यक्रम में जावेद अख्तर (Javed Akhtar) ने कहा, ‘धर्म ने इंसान को बेहतर नहीं, बल्कि ज्यादा डरपोक बनाया है। डर को हथियार बनाकर इंसान की प्रगति रोकी गई।’ उन्होंने यह भी कहा कि वे किसी धार्मिक ग्रंथ को अंतिम सत्य नहीं मानते।
उर्दू किसी एक धर्म की भाषा नहीं
उर्दू को मुस्लिम भाषा कहे जाने पर उन्होंने तीखा विरोध जताया। जावेद अख्तर (Javed Akhtar) के अनुसार, हिंदी-उर्दू एक ही भाषा थीं, जिन्हें ब्रिटिश नीतियों ने अलग किया। उन्होंने प्रेमचंद और निराला जैसे लेखकों का उदाहरण देते हुए कहा कि भाषाएं धार्मिक नहीं, सांस्कृतिक होती हैं।
बुर्का-घूंघट को बताया सामाजिक दबाव
SOA लिटरेरी फेस्टिवल 2025 में जावेद अख्तर ने कहा, ‘लड़कियां चेहरा क्यों ढंकती हैं? यह व्यक्तिगत पसंद नहीं, बल्कि ब्रेनवॉश का नतीजा है।’ उन्होंने बुर्का और घूंघट को महिलाओं की आज़ादी पर सामाजिक दबाव बताया।
RSS की तुलना तालिबान से
2021 में NDTV पर एक बहस के दौरान जावेद अख्तर ने RSS की तुलना तालिबान से कर दी थी। उन्होंने कहा कि धार्मिक राष्ट्र की सोच दोनों में वैचारिक समानता रखती है। इस बयान पर मानहानि केस तक हुआ, जो बाद में सुलझ गया।
कलाकार का काम सत्ता से सवाल करना
जावेद अख्तर का मानना है कि कलाकार का धर्म सत्ता की चाटुकारिता नहीं, बल्कि समाज को आईना दिखाना है। उन्होंने कहा कि डर के माहौल में चुप्पी लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है।
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